मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा संचालित ‘सांझा चूल्हा’ योजना कागजों पर तो दौड़ रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बच्चों का निवाला परोसने वाली महिलाएं अब पाई-पाई को मोहताज हैं। भोपाल संचनालय द्वारा 16 दिसंबर को जिला कार्यक्रम अधिकारी ने स्पष्टीकरण माँगते हुए सख्ती दिखाई गई थी। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सुस्ती ने आंगनबाड़ियों और स्कूलों की रसोई में संकट खड़ा कर दिया है। 4 महीने से भुगतान न होने के कारण अब किराना दुकानदारों ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं, जिससे बच्चों के पोषण आहार पर ताला लगने की नौबत आ गई है।
मामला क्या है
मिली जानकारी के अनुसार, प्रत्येक महिला स्व-सहायता समूह को औसतन 40 हजार रुपये प्रतिमाह भुगतान तय है, जिससे किराना, सब्ज़ी, दाल-चावल, ईंधन और आवश्यक खर्च पूरे किए जाते हैं। चार माह से भुगतान शून्य है, यानी एक-एक समूह का करीब ₹1.60 लाख विभाग पर बकाया है। दुकानदारों ने अब पुराना पैसा मांगे बिना नया सामान देने को तैयार नहीं हैं।
संचनालय की सख्ती, लेकिन जिले में ‘सन्नाटा’
जानकारी के मुताबिक, 16 दिसंबर को भोपाल संचनालय ने खंडवा महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) को पत्र लिखकर जवाब तलब किया गया था। विभाग ने सीधा सवाल पूछा था कि “जब बच्चे रोज भोजन कर रहे हैं, तो उनका भुगतान क्यों रोका गया है?” लेकिन इस पत्र के हफ्ता भर बीत जाने के बाद भी न तो कोई ठोस समाधान निकला और न ही महिलाओं के खातों में राशि पहुँची।
DDRO पावर मौजूद, फिर देरी क्यों?
विभाग के भीतर से छनकर आ रही खबरें और भी चौंकाने वाली हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग के पास DDRO पावर मौजूद है। यानी भुगतान करने के वित्तीय अधिकार जिले के पास ही हैं। सवाल उठता है कि जब शासन स्तर से राशि जारी हो चुकी है और स्थानीय अधिकारियों के पास भुगतान की चाबी है, तो फिर फाइलों को क्यों रोका गया है?
महिलाओं के गंभीर आरोप:
- शासन से पैसा समय पर आता है, लेकिन जिला स्तर पर इसे महीनों अटकाया जाता है।
- जब तक ट्रैक्टर कलेक्टर कार्यालय नहीं पहुँचते, तब तक विभाग की नींद नहीं खुलती।
22 दिसंबर से ‘महायुद्ध’: किश्तें बंद करने की चेतावनी
हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि प्रांतीय महिला स्व-सहायता समूह महासंघ ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
“अगर जल्द भुगतान नहीं हुआ, तो 22 दिसंबर से पूरे मध्य प्रदेश में ऋण किश्तों (Loan Installments) का भुगतान बंद कर दिया जाएगा।”
जब महिलाओं के पास लागत राशि और वर्तन मद का पैसा ही नहीं बचेगा, तो वे बैंकों का कर्ज कैसे चुकाएंगी? यह सवाल अब प्रशासनिक गलियारों में गूँज रहा है।
चर्चा और चिंता का विषय
खंडवा में ‘सांझा चूल्हा’ योजना फिलहाल सरकारी फाइलों और महिलाओं के संघर्ष के बीच फंसी हुई है। संचनालय की सख्ती के बाद भी जमीनी स्तर पर भुगतान न होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अगर जल्द ही ₹1.60 लाख की बकाया राशि जारी नहीं हुई, तो पोषण आहार योजना पूरी तरह ठप हो सकती है, जिसका सीधा असर जिले के हजारों मासूम बच्चों पर पड़ेगा।








