मध्य प्रदेश में एक तरफ सरकार ‘अन्नदाता’ की आय दोगुनी करने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की दीमक व्यवस्था को खोखला कर रही है। सिंगरौली जिले के बैढ़न क्षेत्र से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां सेवा सहकारी समिति मर्यादित गहिलरा में रिश्वत न देने पर एक किसान का धान पंजीयन जानबूझकर कम करने का आरोप लगा है। पीड़ित किसान का कहना है कि महज 1500 रुपये की घूस न देने की सजा उसे ₹50,000 के आर्थिक नुकसान के रूप में मिली है।
“रिश्वत दो या नुकसान झेलो”— किसान की आपबीती
ग्राम कंजी (खुटार) के निवासी किसान राजपति शाह ने अपनी व्यथा जिला कलेक्टर के सामने रखी है। राजपति के अनुसार, जब वह समिति में धान उपार्जन के लिए पंजीयन कराने पहुंचे, तो वहां मौजूद ऑपरेटर ने उनसे 1500 रुपये की मांग की।
किसान ने जब पैसे देने से इनकार किया, तो ऑपरेटर ने उन्हें बातों में उलझा दिया और मौखिक रूप से 60 क्विंटल धान पंजीयन होने का भरोसा दिया।
जब किसान अपनी उपज बेचने के लिए स्लॉट बुक कराने ऑनलाइन पोर्टल पर पहुंचे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। पोर्टल पर 60 क्विंटल की जगह केवल 14 क्विंटल धान ही दर्ज था।
₹50,000 का सीधा झटका, किसान ने लगाई न्याय की गुहार
पीड़ित किसान का कहना है कि उनकी मेहनत की कमाई पर भ्रष्टाचार की गाज गिरी है। 60 क्विंटल की फसल तैयार है, लेकिन सिस्टम में केवल 14 क्विंटल दर्ज होने के कारण वह अपनी बाकी उपज सरकारी दाम पर नहीं बेच पा रहे हैं। इससे उन्हें करीब 50 हजार रुपये का सीधा घाटा हो रहा है।
अधिकारियों की जांच का ‘रटा-रटाया’ आश्वासन
मामला गरमाने के बाद सहकारिता उपायुक्त पी.के. मिश्रा ने संज्ञान लिया है। उन्होंने मीडिया को बताया कि शिकायत उनके पास पहुँची है और पूरे प्रकरण की बारीकी से जांच कराई जाएगी। उन्होंने आश्वासन दिया कि यदि समिति स्तर पर किसी भी कर्मचारी की संलिप्तता या जानबूझकर की गई गड़बड़ी पाई जाती है, तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती धान उपार्जन व्यवस्था?
यह कोई पहला मामला नहीं है जब धान खरीदी केंद्रों या समितियों पर किसानों को परेशान करने की खबरें आई हों। राजपति शाह की शिकायत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- क्या समितियों में बैठे ऑपरेटर अपनी मर्जी से पंजीयन के आंकड़े बदल रहे हैं?
- क्या बिना रिश्वत लिए छोटे किसानों का काम होना अब नामुमकिन हो गया है?
- सरकारी पोर्टल पर दर्ज डेटा की क्रॉस-चेकिंग की कोई पुख्ता व्यवस्था क्यों नहीं है?
सिंगरौली का यह पूरा मामला प्रशासनिक पारदर्शिता की पोल खोलता है। किसान को अब कलेक्टर से ही उम्मीद है कि उन्हें उनके हक की उपज बेचने का पूरा अधिकार मिले। यदि जांच में देरी हुई या दोषियों को बचाया गया, तो जिले के अन्य किसानों में भी आक्रोश पनप सकता है।








