मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रशासनिक संवेदनहीनता ने हजारों मासूमों के निवाले पर संकट खड़ा कर दिया है। विभाग के जिला आहरण एवं संवितरण अधिकारी के अवकाश पर जाने और वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण पूरी भुगतान प्रक्रिया ‘कोमा’ में चली गई है। नतीजा यह है कि पिछले 6 महीनों से भुगतान की राह ताक रहे महिला स्व-सहायता समूहों ने अब हाथ खड़े कर दिए हैं और जिले के चारों विकासखंडों में ‘सांझा चूल्हा’ योजना पूरी तरह ठप हो गई है।
DDEO पावर की ‘छुट्टी’ और फाइलों का अंबार
विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिले में वित्तीय प्रबंधन की रीढ़ कहे जाने वाले DDEO (District Drawing & Expenditure Officer) वर्तमान में अवकाश पर हैं। विडंबना यह है कि इस महत्वपूर्ण पद का प्रभार किसी अन्य सक्षम अधिकारी को प्रभावी ढंग से नहीं सौंपा गया।
भुगतान से जुड़ी सैकड़ों फाइलें धूल फांक रही हैं। कोई भी वित्तीय निर्णय लेने वाला जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं है, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन पूरी तरह बाधित है।
₹2.40 लाख का बकाया, कैसे जलेगा चूल्हा?
खंडवा, खालवा, पंधाना और पुनासा विकासखंड के महिला समूहों की स्थिति दयनीय हो चुकी है। प्रत्येक समूह का औसतन ₹40,000 प्रति माह का भुगतान लंबित है।
समूहों का पिछले आधे साल से भुगतान नहीं हुआ है।
प्रति समूह करीब ₹2.40 लाख की राशि विभाग पर बकाया हो चुकी है।
स्थानीय किराना दुकानदारों ने अब समूहों को सामान देना बंद कर दिया है, जिससे आंगनबाड़ियों और स्कूलों की रसोइयों में ताले लग गए हैं।
बच्चों का भोजन बंद, कर्मचारियों की सैलरी भी ‘लेट’
इस प्रशासनिक विफलता का असर केवल बच्चों के पोषण तक सीमित नहीं है। विभाग के कर्मचारियों को भी समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है।
एक तरफ समूहों की आजीविका छिनी है, तो दूसरी तरफ विभागीय कर्मचारी भी आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।
कुपोषण से लड़ने का दावा करने वाले विभाग की इस लापरवाही ने सीधे तौर पर बच्चों के स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है।
संभाग के निर्देश भी ‘कागजी शेर’ साबित हुए
हैरानी की बात यह है कि संभाग स्तर से आला अधिकारियों ने इस संबंध में पत्र लिखकर जवाब तलब किया और फटकार भी लगाई, लेकिन खंडवा जिले में इसका कोई असर नहीं हुआ। शिकायतों और पत्राचार का अंबार लगा है, लेकिन जमीनी स्तर पर भुगतान की प्रक्रिया ‘शून्य’ है।
जिला महिला-बाल विकास की स्थिति ‘देखने योग्य’
आज विभाग की कार्यप्रणाली स्वयं एक सवाल बन गई है:
- अधिकारी अवकाश पर हैं और निगरानी का तंत्र ध्वस्त है।
- वैकल्पिक प्रभार न सौंपकर पूरे सिस्टम को बंधक बना लिया गया है।
- क्या सरकारी छुट्टियों और प्रभार के खेल के बीच बच्चों का भूखा रहना जायज है?








