बुरहानपुर। अपनी उपजाऊ जमीन और आजीविका के लिए लड़ रहे बुरहानपुर के किसानों ने गुरुवार को विरोध प्रदर्शन का एक ऐसा तरीका अपनाया, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी और खींच लिया है। ज्ञातव्य है कि पांगरी बांध परियोजना से प्रभावित किसानों ने खुद को ‘आदिमानव’ के रूप में पेश कर सरकार के खिलाफ शंखनाद किया। पिछले दो वर्षों से चल रहे इस सत्याग्रह में यह अब तक का सबसे अनोखा प्रदर्शन था।
’आदिमानव’ बनकर जताया विरोध
आंदोलनकारी किसान अपनी मांगों को लेकर कमर में केले के पत्ते लपेटे और सिर पर सागवान के पत्ते बांधे हुए नजर आए। किसानों का यह प्रतीकात्मक स्वरूप सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार था।
किसान नेता डॉ. रवि कुमार पटेल ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों को ‘आदिमानव’ वाले युग में धकेलना चाहती है। सरकार को लगता है कि किसानों को न तो बेहतर स्वास्थ्य चाहिए, न शिक्षा और न ही सम्मानजनक जीवन। इसीलिए उनकी बेशकीमती जमीन के बदले ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान न्यूनतम मुआवजा दिया जा रहा है।
कानून और संविधान का दिया हवाला
किसानों ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग कोई खैरात नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार है।
भूमि अधिग्रहण कानून 2013
इस कानून के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में अधिग्रहित भूमि पर बाजार दर से दो गुना मुआवजा और पुनर्वास का स्पष्ट प्रावधान है।
अनुच्छेद 300A
किसानों ने संविधान के अनुच्छेद 300A और ‘राइट टू लाइफ विद डिग्निटी’ (सम्मान के साथ जीने का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा कि बिना उचित प्रक्रिया और पारदर्शिता के उनकी जमीन नहीं ली जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
आंदोलनकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय के उन फैसलों का भी उल्लेख किया जो भूमि मालिकों को उचित मुआवजे के बिना बेदखल करने से रोकते हैं।
”उग्र होगा आंदोलन, जिम्मेदारी सरकार की होगी”
किसानों ने सरकार को सीधी चेतावनी दी है कि यदि न्यूनतम मुआवजे की नीति को नहीं बदला गया और दो गुना मुआवजे की मांग नहीं मानी गई, तो वे उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। किसानों का कहना है कि उनकी पीढ़ियों की कमाई और आजीविका का साधन छीना जा रहा है, जिसे वे किसी भी कीमत पर चुपचाप सहन नहीं करेंगे।
बुरहानपुर का यह ‘आदिमानव आंदोलन’ विकास और विस्थापन के बीच छिड़ी उस जंग को बयां करता है जहाँ किसान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इन अन्नदाताओं की जायज मांगों पर क्या रुख अपनाती है।








