उमरिया (करकेली)। “साहब, मैं 80 साल का हो चुका हूँ, अब सच में मौत करीब है। कम से कम मरने से पहले तो मुझे कागजों में जिंदा कर दो ताकि मैं चैन की रोटी खा सकूँ।” यह दर्दनाक गुहार किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि उमरिया जिले की जनसुनवाई में पहुँचे एक बेबस बुजुर्ग की हकीकत है। सरकारी रिकॉर्ड की एक बड़ी लापरवाही ने एक जीवित इंसान को पिछले 12 सालों से ‘लाश’ बना रखा है।
पंचायत ने कागजों में ‘मार डाला’, 12 साल से सरकारी लाभ शून्य
मामला करकेली जनपद के सहजनारा ग्राम पंचायत का है। यहाँ के निवासी घमीरा बैगा (80 वर्ष) पिछले 12 वर्षों से सरकारी तंत्र की क्रूरता का दंश झेल रहे हैं। रिकॉर्ड में ‘मृत’ घोषित होने के कारण उन्हें न तो वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है, न राशन और न ही अन्य किसी सरकारी योजना का लाभ।
विशेष रूप से संरक्षित ‘बैगा जनजाति’ के उत्थान के लिए सरकार करोड़ों का बजट आवंटित करती है, लेकिन घमीरा बैगा जैसे पात्र लोग आज दाने-दाने को मोहताज हैं।
कलेक्टर की चौखट पर सैकड़ों चक्कर, पर समाधान ‘शून्य’
मंगलवार को हुई जनसुनवाई में जब यह बुजुर्ग अपने कांपते हाथों में आवेदन लेकर पहुँचा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। घमीरा बैगा ने रुआंसे गले से कहा कि वह सैकड़ों बार कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काट चुके हैं। हर बार आश्वासन मिलता है, लेकिन पंचायत स्तर पर सुधार नहीं होता।
पंचायत की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल:
फर्जीवाड़ा
क्या किसी और को लाभ देने के लिए घमीरा को मृत घोषित किया गया?
लापरवाही
12 साल तक एक जीवित व्यक्ति को मृत दिखाना केवल क्लर्क की गलती है या कोई बड़ा घोटाला?
संवेदनहीनता
जनसुनवाई में बार-बार आने के बावजूद प्रशासन की चुप्पी क्या दर्शाती है?
जिले में यह पहली ‘लाश’ नहीं है!
उमरिया जिले की पंचायतों से अक्सर ऐसी खबरें सामने आती रहती हैं। कभी जीवित व्यक्ति खुद को जिंदा साबित करने के लिए लड़ता है, तो कभी असली मृतकों के नाम पर आवास योजना की राशि निकाल ली जाती है। यह घटनाक्रम जिला प्रशासन की कार्यशैली और पंचायतों में फैले भ्रष्टाचार के दीमक को उजागर करता है।
पीड़ित बुजुर्ग घमीरा बैगा ने कहा कि मेरे पंचायत के लोगों ने मुझे मार डाला है। अब मैं बेसहारा हूँ, खाने तक के लाले पड़े हैं। सरकारी दफ्तरों की ठोकरें खाते-खाते अब थक चुका हूँ।”
कागजों की जंग और टूटती सांसें
घमीरा बैगा की यह ‘दहाड़’ केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि उस सिस्टम को आईना है जो ‘डिजिटल इंडिया’ के दौर में भी एक जीवित आदिवासी को पहचान नहीं दे पा रहा है। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो शायद कागजों में जिंदा होने से पहले ही घमीरा बैगा की साँसे वाकई थम जाएँगी। प्रशासन को इस मामले में तत्काल संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्रवाई करनी चाहिए।








