मैहर। देश जब 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा था और मंचों से ‘बच्चों को देश का भविष्य’ बताने वाले भाषण दिए जा रहे थे, ठीक उसी समय मैहर जिले के शासकीय हाई स्कूल भटिंगवा में इस ‘भविष्य’ का घोर अपमान किया जा रहा था। यहाँ स्कूल प्रबंधन ने मासूम बच्चों को भोजन कराने के लिए बर्तन या पत्तल तक उपलब्ध नहीं कराए, बल्कि स्कूल की रद्दी कॉपियों और किताबों के पन्ने फाड़कर उन पर हलवा-पूड़ी परोस दिया।
स्वास्थ्य और सम्मान से खिलवाड़: फर्श पर बिछाए कागज
सोशल मीडिया पर वायरल हुए विचलित करने वाले वीडियो ने प्रशासनिक दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं:
स्याही वाला भोजन
बच्चों को जिन कॉपियों के पन्नों पर भोजन दिया गया, उन पर लिखी स्याही सेहत के लिए बेहद घातक होती है। स्कूल प्रबंधन ने बिना किसी झिझक के बच्चों के स्वास्थ्य को दांव पर लगा दिया।
खुले में कड़ाके की ठंड
कड़ाके की सर्दी के बीच मासूम बच्चे खुले आसमान के नीचे जमीन पर बैठने को मजबूर थे। उनके पास न तो बैठने की सही व्यवस्था थी और न ही गरिमापूर्ण तरीके से भोजन करने का साधन।
“क्या गरीबों के बच्चों का कोई आत्मसम्मान नहीं?”
इस घटना के बाद प्रदेश भर में आक्रोश है।
“यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि उन बच्चों के आत्मसम्मान पर चोट है जो सरकारी उम्मीद के सहारे स्कूल आते हैं। जिस स्कूल में किताबों का सम्मान सिखाया जाना चाहिए, वहां किताबें फाड़कर उनमें खाना परोसा जा रहा है।”
— स्थानीय नागरिक
प्रशासनिक चुप्पी और उठते सवाल
भटिंगवा हाई स्कूल की इस करतूत ने जिला शिक्षा विभाग को कठघरे में खड़ा कर दिया है:
बजट का खेल
राष्ट्रीय पर्व पर विशेष भोज के लिए आवंटित बजट आखिर गया कहां?
प्रबंधन की तानाशाही
क्या प्राचार्य और शिक्षकों को बच्चों को इंसान समझने में भी गुरेज है?
जांच या दिखावा
श्योपुर के बाद मैहर में ऐसी पुनरावृत्ति बताती है कि व्यवस्था में सुधार के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है।
कागजों पर विकास, कॉपियों पर खाना
एक तरफ सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘विकसित भारत’ की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ मैहर की यह तस्वीर बताती है कि जमीनी हकीकत आज भी ‘रद्दी के पन्नों’ जैसी ही फटी हुई है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस अमानवीय कृत्य के लिए जिम्मेदार स्कूल स्टाफ पर क्या कड़ी कार्रवाई करता है।








