खंडवा में जमीन विवाद अब जानलेवा संघर्ष, न्याय के लिए किसान ने जान दांव पर लगाई
खबर मंडी न्यूज़
खंडवा जिले में एक बार फिर जमीन विवाद ने खतरनाक मोड़ ले लिया है। न्याय की आस में दर-दर भटक रहा किसान जब प्रशासन से निराश हो गया, तो उसने अपनी जान जोखिम में डालते हुए हाई टेंशन बिजली लाइन के टावर पर चढ़कर विरोध दर्ज कराया। यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता और रसूखदारों के दबाव में दबती आवाज़ों का आईना बनता जा रहा है।
पीड़ित किसान रोहित पाल ने आरोप लगाया है कि उसका जमीन विवाद लंबे समय से लंबित है, लेकिन बार-बार आवेदन, शिकायत और गुहार लगाने के बावजूद न तो जमीन की सही नापती की गई और न ही विवाद का कोई ठोस समाधान निकाला गया।
तीसरी बार उठाया खतरनाक कदम
रोहित पाल का यह पहला विरोध नहीं है। इससे पहले भी वह तीन बार हाई टेंशन लाइन के टावर पर चढ़ चुका है, लेकिन हर बार प्रशासन ने केवल अस्थायी समझाइश देकर मामला टाल दिया। किसान का कहना है कि “हर बार आश्वासन मिलता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत वही की वही रहती है।”
पूर्व भाजपा विधायक देवेंद्र वर्मा पर सीधे आरोप
किसान रोहित पाल ने इस पूरे विवाद में पूर्व भाजपा विधायक देवेंद्र वर्मा का नाम लेते हुए आरोप लगाया है कि उनके प्रभाव के चलते जमीनी विवाद का समाधान जानबूझकर नहीं किया जा रहा। रोहित का दावा है कि सामने वाला पक्ष राजनीतिक संरक्षण में है, इसी कारण प्रशासन निष्पक्ष कार्रवाई करने से बच रहा है।
एसडीएम पर डराने-धमकाने का आरोप
किसान ने खंडवा एसडीएम पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। रोहित पाल का कहना है कि जब वह न्याय की मांग लेकर कार्यालय पहुंचता है, तो उसे डराया-धमकाया जाता है, बजाय इसके कि उसकी शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो।
प्रशासन पर गंभीर सवाल
रोहित पाल के अनुसार:
जमीन की सही और निष्पक्ष नापती नहीं की गई
बार-बार दिए गए आवेदनों का कोई निराकरण नहीं हुआ
प्रशासन केवल समय खींचने की नीति अपना रहा है
किसान का साफ कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो उसे इस तरह जान जोखिम में डालने की जरूरत नहीं पड़ती।
विवाद के समाधान का नाम नहीं
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पूर्व विधायक देवेंद्र वर्मा और जमीन के दूसरे पक्ष के बीच विवाद समाधान की कोई पहल नहीं हो रही है। न तो संवाद की कोशिश दिखाई देती है और न ही प्रशासन द्वारा मध्यस्थता का कोई ठोस प्रयास।
प्रश्नों के घेरे में प्रशासन
अब बड़ा सवाल यह है कि:
क्या रसूखदारों के आगे प्रशासन बेबस है?
क्या किसान को न्याय पाने के लिए हर बार जान जोखिम में डालनी पड़ेगी?
आखिर कब होगी जमीन की निष्पक्ष नापती और विवाद का स्थायी समाधान?
फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक संवेदनहीनता और राजनीतिक दबाव का प्रतीक बन चुका है। यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो किसी दिन यह विरोध किसी बड़े हादसे में भी बदल सकता है, जिसकी जिम्मेदारी से कोई बच नहीं पाएगा।








