निमाड़ में बाल संरक्षण संकट गहराया: 2022 से मान्यता प्राप्त इकलौते दत्तक केंद्र को नहीं मिला वित्तीय सहयोग


खंडवा। निमाड़ अंचल में बाल संरक्षण की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। जिले में बालिका गृह कई वर्षों से बंद है, शासकीय बालक गृह भी एक वर्ष से अधिक समय से संचालित नहीं हो रहा है और अब इकलौते शिशु ग्रह द्वारा भी अस्थायी रूप से नए बच्चों को प्रवेश न देने का निर्णय स्थिति को और गंभीर बना रहा है। सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने इसे मानवीय संवेदना से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
इनके द्वारा बताया गया संस्था संचालक
खंडवा स्थित शिशु गृह ने भवन मरम्मत कार्य के चलते विभाग को पत्र भेजकर सूचित किया है कि आगामी दो माह तक नए बच्चों को अस्थायी रूप से संरक्षण हेतु स्वीकार नहीं किया जाएगा।
संस्था ने स्पष्ट किया है कि निर्माण कार्य पूर्ण होने तक बच्चों के प्रवेश पर रोक रहेगी, ताकि सुरक्षा और व्यवस्था प्रभावित न हो।2022 में मिली मान्यता, पर सहयोग शून्य
खंडवा में संचालित “किलकारी शिशु ग्रह” को वर्ष 2022 में सहज समागम फाउंडेशन के नाम से विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण (Specialized Adoption Agency) की विधिवत मान्यता प्राप्त हुई थी।

संस्था संचालक के अनुसार, मान्यता मिलने के बाद से अब तक किसी प्रकार का नियमित वित्तीय सहयोग शासन या विभाग की ओर से उपलब्ध नहीं कराया गया है।
उन्होंने बताया कि संस्था एक दिन से 6 वर्ष तक के बच्चों का संरक्षण, पोषण, चिकित्सा देखभाल और दत्तक प्रक्रिया जैसे संवेदनशील कार्य स्वयं के संसाधनों और दानदाताओं के सहयोग से संचालित कर रही है।
संचालक ने स्पष्ट कहा कि “2022 में विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण की मान्यता मिलने के बाद से आज तक एक रुपये का भी सीधा आर्थिक सहयोग विभाग द्वारा नहीं दिया गया है।”
महिला एवं बाल विकास विभाग समय-समय पर निरीक्षण करता है, बच्चों को संस्था के सुपुर्द भी करता है, लेकिन संचालन व्यय, भवन, स्टाफ और अन्य व्यवस्थाओं के लिए ठोस आर्थिक सहायता नहीं दी जाती। संस्था का कहना है कि विभाग सहयोग देने के बजाय अपेक्षाएं अधिक रखता है।
भवन निर्माण के कारण दो माह तक नए प्रवेश पर रोक
संस्था को नगर निगम से नए भवन निर्माण की अनुमति मिल चुकी है। आगामी दो से तीन माह तक निर्माण कार्य प्रस्तावित है। इस दौरान संस्था ने विभाग को लिखित पत्र देकर सूचित किया है कि भवन कार्य पूर्ण होने तक नए बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा।
ऐसे समय में जब जिले में अन्य कोई सक्रिय शासकीय बाल गृह उपलब्ध नहीं है, यह निर्णय प्रशासनिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर सकता है।
बालिका गृह वर्षों से बंद, बालक गृह भी निष्क्रिय

बाल कल्याण समिति अध्यक्ष प्रवीण शर्मा ने बताया कि जिले में बालिका गृह कई वर्षों से बंद है, जबकि शासकीय बालक गृह भी पिछले एक वर्ष से अधिक समय से संचालित नहीं हो रहा है।
उन्होंने कहा कि खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर और हरदा जैसे जिलों के लिए एकमात्र शिशु गृह खंडवा में ही संचालित हो रहा है। ऐसे में यहां अस्थायी रूप से बच्चों का प्रवेश बंद होना चार जिलों के लिए गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकता है।
अस्पताल में पांच नवजात, दो को विशेष चिकित्सकीय देखरेख
जानकारी के अनुसार, खंडवा के अस्पताल परिसर में वर्तमान में पांच ऐसे नवजात शिशु हैं, जो विभिन्न कारणों से माता-पिता का संरक्षण नहीं पा सके हैं। इनमें परित्यक्त बच्चे, नाबालिग माताओं से जन्मे शिशु और शोषण से जुड़े मामलों में जन्मे नवजात शामिल बताए जा रहे हैं।
इनमें से दो बच्चों को चिकित्सकों द्वारा विशेष निगरानी में रखा गया है। वे समयपूर्व (प्रिमेच्योर) जन्म की स्थिति में थे, जिन्हें स्वस्थ और स्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है। चिकित्सकीय रूप से सक्षम होने के बाद उन्हें संस्था को सौंपने की तैयारी है।
लेकिन संस्था द्वारा अस्थायी रूप से नए बच्चों को न लेने के निर्णय से इन नवजातों के भविष्य को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।
वित्तीय प्रस्ताव लंबित, राजनीतिक हस्तक्षेप की तैयारी
संस्था से संबंधित वित्तीय प्रस्ताव दिल्ली में Project Approval Board (P.A.B.) की बैठक में लंबित है। महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया द्वारा आश्वासन दिया गया है कि प्रस्ताव नियमानुसार रखा जाएगा, किंतु अंतिम स्वीकृति अभी शेष है।
इधर, इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक हस्तक्षेप की भी तैयारी हो रही है।
खंडवा सहित निमाड़ क्षेत्र में शासकीय बालक एवं बालिका गृह तत्काल प्रारंभ किए जाएं।
सहज समागम फाउंडेशन को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।
2022 से लंबित सहयोग और P.A.B. प्रस्ताव को प्राथमिकता से स्वीकृति दी जाए।
वर्षों से मंडरा रहा संकट, स्थायी समाधान का इंतजार
निमाड़ में बाल संरक्षण का संकट वर्षों से बना हुआ है। बालिका गृह बंद, बालक गृह निष्क्रिय, इकलौते दत्तक केंद्र को वित्तीय सहयोग नहीं, और अब अस्थायी प्रवेश रोक—यह स्थिति प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
बाल संरक्षण केवल विभागीय औपचारिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व और मानवीय संवेदना का प्रश्न है। यदि समय रहते ठोस और स्थायी समाधान नहीं किया गया, तो निराश्रित और परित्यक्त बच्चों का भविष्य असुरक्षित होता जाएगा।
अब नजरें शासन के निर्णय पर टिकी हैं कि निमाड़ के इस लंबे समय से चले आ रहे संकट का समाधान कब और कैसे किया जाएगा।








