अंबाह (मुरैना)। मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की अंबाह तहसील में भ्रष्टाचार का एक ऐसा नमूना सामने आया है जिसे देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे। चंबल कॉलोनी में बना एक ‘सामुदायिक भवन’ एमपी में सरकारी धन के दुरुपयोग की पराकाष्ठा बन गया है। आदिम जाति कल्याण विभाग और ग्रामीण यांत्रिकी विभाग (RES) ने मिलकर एक ऐसे निर्माण को अंजाम दिया है, जिसकी लागत और आकार का गणित किसी के भी गले नहीं उतर रहा। महज 330 वर्गफीट (एक सामान्य कमरे के बराबर) की जगह में 42 लाख रुपये फूंक दिए गए, लेकिन आज यह भवन एक बार भी उपयोग में आए बिना कंडम हो चुका है।
कागजों में सब पूरा, जमीन पर कुछ नहीं?
वर्ष 2019 से 2021 के बीच निर्मित इस भवन का क्षेत्रफल महज 15 फीट × 22 फीट 330 वर्गफीट है इस भवन के निर्माण में अधिकतम 5 से 7 लाख रुपये खर्च होने चाहिए थे। लेकिन इसके लिए स्वीकृत की गई सामग्री की सूची किसी बड़े महल से कम नहीं है। वहीं भवन निर्माण के जानकारों और वर्तमान बाजार दर के अनुसार, 1500 रुपये प्रति वर्गफीट की दर से एक आलीशान निर्माण किया जा सकता है। विभाग ने इसमें 41.80 लाख रुपये खर्च दिखा दिए। यानी वास्तविक लागत से करीब 6 गुना अधिक पैसा कागजों पर बहाया गया।
फाइलों में दर्ज सामान बनाम जमीनी हकीकत:
| सामग्री | कागजों में संख्या | वर्तमान स्थिति |
| पंखे | 22 | नदारद |
| T5 ट्यूबलाइट | 20 | एक भी नहीं |
| LED स्ट्रीट लाइट | 14 | गायब |
| नल टोटी | 15 | गायब |
| पानी की टंकी | 03 | गायब |
| बोरवेल | 01 | बिना खुदाई के ‘पूर्ण’ |
सबसे बड़ा सवाल: बिना खुदाई कैसे हुआ बोर?
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य बोरवेल का है। विभाग ने कागजों पर बोरवेल की खुदाई और स्थापना का पूरा पैसा आहरित कर लिया, जबकि मौके पर खुदाई के कोई निशान तक नहीं हैं। हैरानी तो इस बात की है कि वर्ष 2022 में अंबाह नगर पालिका ने भी इस निर्माण की पुष्टि करते हुए प्रमाण पत्र जारी कर दिया।
“चोरी हो गया सामान” – प्रशासन का रटा-रटाया जवाब
जब मामले ने तूल पकड़ा, तो जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि सामान तो लगा था लेकिन चोरी हो गया। इस जवाब ने कई नए सवालों को जन्म दे दिया है:
सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
यदि 22 पंखे और 20 ट्यूबलाइट चोरी हुईं, तो क्या पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई?
निगरानी में चूक
42 लाख रुपये की सार्वजनिक संपत्ति की निगरानी के लिए RES विभाग ने क्या इंतजाम किए थे?
लागत पर सवाल
क्या 15×22 के एक छोटे से हॉल में 22 पंखे और 15 नल लगाना व्यावहारिक रूप से संभव है, या यह सिर्फ पैसा निकालने का बहाना था?
एक बार भी नहीं हुआ कोई कार्यक्रम
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह भवन सामुदायिक उपयोग के लिए बनाया गया था, लेकिन उद्घाटन के बाद से आज तक यहाँ एक भी सामुदायिक कार्यक्रम नहीं हो सका। खिड़की-दरवाजे टूट चुके हैं, फर्श उखड़ रहा है और यह असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है।
जनता की गाढ़ी कमाई पर ‘डाका’
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह सीधा-सीधा सरकारी धन का गबन है। आदिम जाति कल्याण के नाम पर आए पैसों का उपयोग समाज के उत्थान के लिए होना था, लेकिन यहाँ अफसरों और ठेकेदारों ने मिलकर अपनी जेबें गर्म कर लीं।
आगे क्या होगी कार्रवाई?
इस मामले के उजागर होने के बाद अब जिला प्रशासन क्या कार्रवाई करेगा। क्या दोषियों पर रिकवरी और एफआईआर की कार्रवाई होगी, या यह ‘अजूबा’ भी अन्य घोटालों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?








