“न्याय समझ में आए, तभी न्याय कहलाए!”

“जब फैसला पढ़ने के लिए भी ‘अनुवादक’ चाहिए, तो न्याय कितना अपना है—यह सवाल अब संसद की चौखट पर दस्तक दे चुका है।”

खंडवा/ खबर मंडी विशेष
(सुशील विधाणी)
देश की न्याय व्यवस्था में वर्षों से चली आ रही अंग्रेज़ी प्रधान व्यवस्था पर अब सवाल और भी तीखे होते जा रहे हैं। खंडवा के लोकप्रिय सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने लोकसभा में उच्च न्यायालयों में हिंदी को अनिवार्य करने की मांग उठाकर इस मुद्दे को न केवल राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया, बल्कि आम जनता के मन की बात को भी स्वर दिया है।
आज स्थिति कुछ ऐसी है कि अदालत में खड़ा आम नागरिक अपने ही केस की भाषा नहीं समझ पाता। फैसले अंग्रेज़ी में, दलीलें अंग्रेज़ी में, और कानूनी शब्दावली इतनी जटिल कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी कई बार माथा पकड़ ले। ऐसे में ग्रामीण और गरीब वर्ग के लोगों के लिए न्यायालय किसी “ज्ञान के मंदिर” से ज्यादा “अंग्रेज़ी के किले” जैसे प्रतीत होते हैं, जहां प्रवेश तो मिल जाता है, लेकिन समझ नहीं।
गांव से आया एक व्यक्ति अदालत में पूरी उम्मीद लेकर पहुंचता है, लेकिन बाहर निकलते समय उसके चेहरे पर संतोष नहीं, बल्कि असमंजस होता है—“जीता या हारा?” यह जानने के लिए उसे फिर किसी वकील या जानकार का सहारा लेना पड़ता है। यानी न्याय मिलने के बाद भी उसे “समझने का संघर्ष” अलग से करना पड़ता है।
यही विडंबना सांसद पाटिल ने संसद में उजागर की। उन्होंने अनुच्छेद 348(2) और राजभाषा अधिनियम, 1963 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब कानून पहले से ही उच्च न्यायालयों में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग की अनुमति देता है, तो फिर इसे प्रभावी रूप से लागू करने में हिचक क्यों?
सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने इस मुद्दे को केवल भाषा का विषय नहीं, बल्कि “समान न्याय” का प्रश्न बताया। उनका कहना है कि जब तक व्यक्ति अपने अधिकार, अपनी सुनवाई और अपने फैसले को खुद नहीं समझ पाएगा, तब तक न्याय व्यवस्था अधूरी ही मानी जाएगी।
व्यंग्यात्मक दृष्टि से देखें तो देश में “न्याय सबके लिए समान” का नारा जरूर गूंजता है, लेकिन भाषा ऐसी कि आधी आबादी उस न्याय को पढ़ ही नहीं पाती। अदालतों में अंग्रेज़ी की यह परंपरा अब कई लोगों को “औपनिवेशिक विरासत” का हिस्सा लगने लगी है, जो आज भी आम जनता और न्याय के बीच एक अदृश्य दीवार बनकर खड़ी है।
सांसद पाटिल की यह पहल न केवल हिंदी भाषी राज्यों के लिए, बल्कि पूरे देश में न्याय को अधिक सरल और सुलभ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अगर इस पर गंभीरता से अमल होता है, तो वह दिन दूर नहीं जब अदालतों के फैसले सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आम नागरिक के दिल और दिमाग तक भी साफ-साफ पहुंचेंगे।
अब देखना यह है कि संसद में उठी यह आवाज़ व्यवस्था के गलियारों में कितनी दूर तक गूंजती है—क्योंकि सवाल सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है, जो हर नागरिक न्यायालय की दहलीज पर लेकर जाता है।








