मुरैना। सरकार एक तरफ ‘जननी सुरक्षा’ और ‘निःशुल्क उपचार’ के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन मुरैना जिला अस्पताल की हकीकत इन दावों के ठीक उलट है। यहाँ खुशियों के आगमन (डिलिवरी) के नाम पर गरीब परिवारों की जेब काटने का खेल बदस्तूर जारी है। ताजा मामला सिकरौदा गाँव के एक परिवार के साथ सामने आया है, जहाँ नॉर्मल डिलिवरी के बदले अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगे हैं।
सरकारी अस्पताल में ‘प्राइवेट’ वसूली: क्या है पूरा मामला?
मुरैना के पास स्थित सिकरौदा गाँव के निवासी रिंकू अपनी गर्भवती पत्नी स्वाति को प्रसव पीड़ा होने पर उम्मीद के साथ जिला अस्पताल लेकर पहुँचे थे। लेकिन अस्पताल की दहलीज पर कदम रखते ही उन्हें सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता का सामना करना पड़ा।
पीड़ित परिवार के संगीन आरोप
रिश्वत की मांग स्वाति की सास शिला और पति रिंकू ने ऑन-कैमरा आरोप लगाया कि अस्पताल में मौजूद स्टाफ ने सामान्य (नॉर्मल) डिलिवरी कराने के बदले अवैध रूप से पैसों की मांग की।
बाहर की दवाइयों का खेल
सरकारी अस्पताल में दवाओं का पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद, स्टाफ ने जरूरी इंजेक्शन अस्पताल के स्टोर से देने के बजाय परिजनों को एक विशेष निजी मेडिकल दुकान से खरीदने के लिए मजबूर किया।
“गरीब आदमी कहाँ जाए?”: परिजनों का छलका दर्द
परिजनों का कहना है कि वे मजदूरी कर परिवार पालते हैं। शासकीय अस्पताल में इसलिए आए थे ताकि बेहतर और निःशुल्क इलाज मिल सके, लेकिन यहाँ तो कदम-कदम पर आर्थिक शोषण किया जा रहा है।
“हमें बताया गया था कि यहाँ सब कुछ फ्री है, लेकिन हमसे पैसों की मांग की गई और इंजेक्शन भी बाहर से लाने को कहा गया। अगर हमें बाहर ही पैसे खर्च करने थे तो हम किसी निजी अस्पताल न चले जाते?”
— रिंकू, पीड़ित पति
अस्पताल प्रबंधन पर उठते सवाल
मुरैना जिला अस्पताल में इस तरह की शिकायतें नई नहीं हैं। इससे पहले भी कई बार प्रसूति वार्ड में तैनात स्टाफ पर पैसे मांगने और अभद्र व्यवहार के आरोप लग चुके हैं।
- क्या अस्पताल के स्टोर में जरूरी इंजेक्शन मौजूद नहीं थे?
- यदि इंजेक्शन थे, तो बाहर की पर्ची क्यों लिखी गई?
- क्या अस्पताल प्रबंधन का निचली श्रेणी के कर्मचारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है?
प्रशासन से सख्त कार्रवाई की उम्मीद
मामले को लेकर स्थानीय लोगों और परिजनों में भारी आक्रोश है। पीड़ित परिवार ने अब जिला कलेक्टर और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) से लिखित शिकायत कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि जब तक रिश्वतखोर स्टाफ पर गाज नहीं गिरेगी, तब तक जिला अस्पताल की तस्वीर नहीं बदलेगी।
मुरैना जिला अस्पताल में दवाओं की कथित कमी और स्टाफ की मनमानी ने ‘निःशुल्क चिकित्सा’ के सरकारी नारे को खोखला कर दिया है। स्वाति और उसके परिवार के साथ जो हुआ, वह जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बड़ा धब्बा है। अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में केवल ‘जांच’ का आश्वासन देता है या कोई ठोस कार्रवाई भी करता है।








