ढोल-मांदल की थाप पर थिरका निमाड़, भगोरिया में झलकी जनजातीय अस्मिता
पंधाना में जनप्रतिनिधियों की सहभागिता, संस्कृति, परंपरा और उल्लास का विराट संगम

ढोल बजाकर, आदिवासी नृत्य की लय पर मस्ती में मलंग होकर जब खंडवा लोकसभा सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल जनजातीय युवाओं के साथ कदमताल करते नजर आए, तो पूरा भगोरिया मेला उत्साह और उमंग से झूम उठा। पारंपरिक वेशभूषा में सादगी और आत्मीयता के साथ समाज के बीच उतरकर सांसद ने ढोल-मांदल की थाप पर नृत्य किया और जनजातीय संस्कृति के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया।


खबर मंडी न्यूज़
पंधाना विधायक छाया मोरे भी पारंपरिक परिधान में मेले में पहुंचीं और महिलाओं के साथ लोकनृत्य में शामिल होकर आयोजन की गरिमा बढ़ाई। जनप्रतिनिधियों की सहज सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि यह पर्व केवल औपचारिक उपस्थिति का नहीं, बल्कि संस्कृति से आत्मीय जुड़ाव का प्रतीक है।
उल्लास, परंपरा और लोकजीवन की रंगीन झलक
पंधाना एवं बोरगांव क्षेत्र में आयोजित निमाड़ का प्रसिद्ध भगोरिया मेला इस वर्ष भी लोकसंस्कृति का जीवंत उत्सव बनकर सामने आया। मेले में बड़े-छोटे झूले, राय झूला और बच्चों के आकर्षक मनोरंजन साधन विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी झूलों का आनंद लेते दिखाई दिए।
वहीं दूसरी ओर मेले में सजी पारंपरिक दुकानों और ग्रामीण बाजार ने उत्सव को और अधिक जीवंत बना दिया। मालपुआ, जलेबी, कचोरी, भजिए और अन्य पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू से पूरा वातावरण महक उठा। लोगों ने व्यंजनों का लुफ्त उठाने के बाद एक-दूसरे को गुलाल लगाकर मान-प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान के अनुरूप शुभकामनाएं दीं। रंग-गुलाल से सजे चेहरे और ढोल-मांदल की गूंज ने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया।

विवाह परंपरा से जुड़ी अनूठी पहचान
निमाड़ का भगोरिया देश-विदेश में इसलिए भी चर्चित है क्योंकि यह केवल होली पूर्व उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की पारंपरिक वैवाहिक परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। आदिवासी अंचल में वर्षों से चली आ रही मान्यता के अनुसार इस मेले में युवक-युवतियां अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनते हैं।

युवक अपनी पसंद की युवती को गुलाल लगाकर या प्रतीकात्मक रूप से प्रस्ताव रखकर विवाह की इच्छा व्यक्त करता है। आपसी सहमति और परिवारों की स्वीकृति के बाद यह संबंध वैवाहिक बंधन में परिवर्तित होता है। यह परंपरा जनजातीय समाज की सांस्कृतिक स्वतंत्रता, विश्वास और सामाजिक स्वीकृति की अनूठी मिसाल मानी जाती है। इसी विशेषता के कारण भगोरिया को प्रेम, विश्वास और सामाजिक समरसता का पर्व भी कहा जाता है।
जनप्रतिनिधियों के संदेश और प्रशासनिक व्यवस्था
सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने कहा कि भगोरिया हमारी सांस्कृतिक विरासत का गौरव है और इसे सहेजना हम सभी का कर्तव्य है। विधायक छाया मोरे ने भी जनजातीय समाज को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि सरकार क्षेत्र के विकास और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है।
आयोजन के दौरान प्रशासन द्वारा सुरक्षा, यातायात नियंत्रण, पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाओं की समुचित व्यवस्था की गई। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति के बावजूद कार्यक्रम शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित रूप से संपन्न हुआ। स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल सतर्क रहा, जिससे मेले का आनंद निर्बाध रूप से लिया जा सका।
संस्कृति का जीवंत उत्सर्जन
निमाड़ का यह प्रसिद्ध भगोरिया पर्व एक बार फिर यह सिद्ध कर गया कि यह केवल मेला नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता, प्रेम, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव का जीवंत प्रतीक है। जब जनप्रतिनिधि स्वयं ढोल की थाप पर थिरकते हैं, जब युवा अपनी जीवनसंगिनी चुनने की परंपरा निभाते हैं, जब बच्चे झूलों में हंसी बिखेरते हैं और समाज गुलाल से सम्मान प्रकट करता है—तब भगोरिया केवल आयोजन नहीं रहता, वह निमाड़ की आत्मा का उत्सव बन जाता है।








