पुलिस-राजस्व एक मंच पर: आमने-सामने सुनवाई से समाधान की पहल, अवैध कब्जों के मामलों ने खोली सबसे बड़ी चुनौती

| सुशील विधानी
खंडवा। कहा जाता है, “जहां जमीन का मामला हो, वहां इंच-इंच की दूरी भी रिश्तों में मीलों की दरार पैदा कर देती है।” शायद यही वजह है कि जमीन से जुड़े विवाद वर्षों तक अदालतों, तहसीलों और सरकारी दफ्तरों की फाइलों में उलझे रहते हैं। लेकिन अब इन विवादों को कागजों की सीमाओं से निकालकर मौके पर सुलझाने की दिशा में खंडवा जिले में पुलिस और राजस्व विभाग ने संयुक्त पहल शुरू की है।
पुलिस अधीक्षक की पहल पर जिले के सभी थाना परिसरों में भूमि विवाद निवारण शिविर लगाए गए, जहां राजस्व और पुलिस विभाग के अधिकारी एक साथ बैठकर मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। इस व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि आवेदक और अनावेदक दोनों पक्षों को एक साथ बैठाकर उनकी बात सुनी जा रही है, ताकि विवाद का वास्तविक स्वरूप सामने आ सके और समाधान की दिशा में तत्काल कार्रवाई हो।
कोतवाली थाना परिसर में आयोजित संयुक्त शिविर में कोतवाली, मोघट और पदमनगर थाना क्षेत्रों के 30 से अधिक प्रकरण सामने आए। इनमें सबसे अधिक शिकायतें अवैध कब्जे, अतिक्रमण, सीमांकन विवाद और रास्ते के अधिकार से जुड़ी रहीं। कई मामलों में केवल दस्तावेजों पर निर्णय लेने के बजाय अधिकारियों ने मौके पर जाकर निरीक्षण करने का निर्णय लिया, ताकि वास्तविक स्थिति के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
जमीन का विवाद अक्सर केवल खेत, मकान या प्लॉट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई बार यह पारिवारिक रिश्तों में तनाव, पड़ोसियों के बीच विवाद और कानून-व्यवस्था की चुनौती भी बन जाता है। ऐसे मामलों में पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त मौजूदगी से न केवल त्वरित सुनवाई संभव हो रही है, बल्कि दोनों विभागों के बीच बेहतर समन्वय भी दिखाई दे रहा है। फरियादियों को भी अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने से राहत मिलने की उम्मीद जगी है।
कहावत है—”न्याय में जितनी देरी, विवाद उतना ही गहरा।” यही सोच इस पहल के पीछे दिखाई देती है। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही विवादों का समाधान हो जाए तो न केवल मुकदमेबाजी कम होगी, बल्कि सामाजिक सौहार्द भी बना रहेगा।
सिटी एसपी अभिनव बारंगे ने बताया कि पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य भूमि विवादों का त्वरित और प्रभावी निराकरण करना है। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे जमीन विवाद कई बार बड़े आपराधिक मामलों का रूप ले लेते हैं, इसलिए समय रहते उनका समाधान आवश्यक है।
वहीं तहसीलदार नितिन चौहान ने बताया कि प्रत्येक प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए आवश्यकतानुसार स्पॉट निरीक्षण किया जा रहा है। राजस्व अभिलेख, सीमांकन और वास्तविक स्थिति का मिलान कर निष्पक्ष निर्णय की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। उनका कहना है कि इस संयुक्त व्यवस्था से न केवल भूमि विवादों में कमी आएगी, बल्कि जनसुनवाई, सीएम हेल्पलाइन और अन्य लंबित मामलों के निराकरण में भी तेजी आएगी।
चर्चा की बात…
कागजों पर योजनाएं बनाना आसान होता है, लेकिन उनका असर जमीन पर दिखाई देना ही असली कसौटी है। वर्षों से लोग कहते आए हैं कि “जमीन के मामले में फाइलें ज्यादा चलती हैं, फैसले कम होते हैं।” अब पुलिस और राजस्व विभाग की यह संयुक्त पहल उम्मीद जरूर जगाती है। यदि शिविर नियमित रूप से लगते रहे, मौके पर निरीक्षण और समयबद्ध कार्रवाई होती रही, तो यह पहल न केवल विवादों का समाधान करेगी, बल्कि सरकारी व्यवस्था के प्रति जनता का भरोसा भी मजबूत करेगी। आखिर “जहां संवाद होता है, वहां विवाद ज्यादा दिन टिक नहीं पाता।”
खबर मंडी…
जमीन के विवाद वर्षों पुराने हों तो अक्सर लोग कहते हैं कि फैसला अदालत करेगी, लेकिन इस बार फैसला तलाशने की कोशिश थाने में हो रही है। पुलिस और राजस्व विभाग एक ही मेज पर बैठे हैं, दोनों पक्ष आमने-सामने हैं और उम्मीद यह है कि फाइलों की धूल अब जमीन की हकीकत से साफ होगी। अब देखना यह है कि यह पहल केवल शिविरों तक सीमित रहती है या वाकई विवादों की जड़ तक पहुंचती है। क्योंकि “दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है”, इसलिए जनता नतीजों का इंतजार करेगी, दावों का नहीं। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो न केवल कब्जों पर लगाम लगेगी, बल्कि वर्षों से लंबित प्रकरणों को भी नई दिशा मिलेगी। आखिर “जहां नीयत साफ हो, वहां रास्ते अपने आप निकल आते हैं।”




