पोषण पखवाड़ा: मंच पर दावे, जमीन पर अव्यवस्था—खंडवा में आंगनवाड़ी व्यवस्था पर गंभीर सवाल
कार्यशाला में पोषण सुधार की बात, लेकिन हकीकत में वितरण, निगरानी और संचालन पर उठे बड़े प्रश्न
खंडवा में आंगनबाड़ी सहायिका ने खोली विभाग की पोल पोषण पखवाड़ा के दावों के बीच जमीनी हकीकत उजागर
खंडवा/ खबर मंडी विशेष
खंडवा महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा जिले में “पोषण पखवाड़ा” के अंतर्गत जिला स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस वर्ष की थीम “जीवन के पहले 6 वर्षों में मस्तिष्क का अधिकतम विकास” रखी गई है। कार्यक्रम में जिला कार्यक्रम अधिकारी श्रीमती रत्ना शर्मा, शहर परियोजना अधिकारी, पर्यवेक्षक एवं विभागीय अमला उपस्थित रहा। पोषण पर आधारित प्रदर्शनी, पौष्टिक व्यंजनों का प्रदर्शन और अंत में पोषण शपथ के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया। मंच से पोषण सुधार, जनभागीदारी और बच्चों के उज्जवल भविष्य की बात की गई, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। कागजों में योजनाएं, धरातल पर लापरवाही खंडवा जिले में आंगनवाड़ी केंद्रों के संचालन को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि अधिकांश केंद्र नियमित रूप से संचालित नहीं हो रहे। कहीं गर्मी का बहाना है, तो कहीं समय का—न केंद्र तय समय पर खुलते हैं और न ही सेवाएं व्यवस्थित रूप से मिल रही हैं। पोषण आहार वितरण पर उठते गंभीर सवाल पोषण पखवाड़ा का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और बच्चों तक पोषण आहार पहुंचाना है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। कई जगहों पर पोषण आहार का वितरण नियमित नहीं है और पारदर्शिता भी संदिग्ध है। सूत्रों के अनुसार, कुछ मामलों में बिना चालान के आहार सामग्री केंद्रों तक पहुंचाई जाती है और बाद में उसका स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिलता। इससे यह आशंका मजबूत होती है कि पोषण आहार का एक हिस्सा लक्षित हितग्राहियों तक पहुंचने से पहले ही कहीं और डायवर्ट हो रहा है। शहर परियोजना अधिकारी पर आरोप, सहायिका ने खोली पोल अब इस पूरे मामले में सबसे अहम मोड़ तब आया जब शहर परियोजना स्तर पर ही अंदरूनी गड़बड़ियों को उजागर करने का प्रयास शुरू हुआ। बताया जा रहा है कि खंडवा शहर की एक आंगनवाड़ी सहायिका ने जब पोषण आहार वितरण और अन्य अनियमितताओं पर सवाल उठाना शुरू किया, तो उस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया गया। आरोप है कि खंडवा शहर परियोजना अधिकारी पूजा राठौर के कार्यकाल में यह स्थिति बनी, जहां: गड़बड़ियों को उजागर करने पर सहायिका को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, उसे लगातार नोटिस देकर जवाब तलब किया जा रहा है, पारदर्शिता के लिए लगाए गए सीसीटीवी कैमरे को हटवा दिया गया। यह घटनाक्रम यह दर्शाता है कि यदि कोई कर्मचारी व्यवस्था में सुधार के लिए आवाज उठाता है, तो उसे ही दबाने की कोशिश की जा रही है। एडीएम तक शिकायत, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की शिकायत कुछ दिन पूर्व एडीएम देशमुख को लिखित रूप में दी गई थी। इसके बावजूद अब तक न तो व्यवस्थाओं में कोई सुधार दिख रहा है और न ही किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई सामने आई है। उल्टा, शिकायतकर्ता पर दबाव बढ़ने की बात कही जा रही है। प्रशासनिक अव्यवस्था: कार्यालय तक स्पष्ट नहीं महिला एवं बाल विकास विभाग की जिला स्तर की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। जनपद पंचायत कार्यालय के टूटने के बाद विभाग का कार्यालय स्थानांतरित तो हुआ, लेकिन अब तक उसका स्थायी संचालन स्पष्ट नहीं हो पाया है। बताया जा रहा है कि जिला कार्यक्रम अधिकारी तक के बैठने की व्यवस्था स्पष्ट नहीं है और कार्यालय की स्थिति को लेकर आमजन भटकते नजर आ रहे हैं। अधिकारी मौन, सवाल बरकरार जब इन सभी मुद्दों पर संबंधित अधिकारियों से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया, तो संपर्क नहीं हो सका। अधिकारियों की चुप्पी ने इन आरोपों को और गंभीर बना दिया है। अंतिम और सबसे बड़ा सवाल सबसे बड़ा सवाल अब यह उठता है कि—
जब आंगनवाड़ी केंद्र बंद थे, तब पोषण आहार की बोरियां दीवार के ऊपर से अंदर फेंककर क्यों रखी गईं?
क्यों न संबंधित कार्यकर्ता को इसकी सूचना दी गई और न ही टीएचआर (Take Home Ration) को सही तरीके से हितग्राहियों तक पहुंचाया गया?
जब यही पोषण आहार धात्री महिलाओं और बच्चों तक घर-घर पहुंचाने का दावा करता है, तो इस प्रकार की प्रक्रिया क्या दर्शाती है?
और यदि शहर स्तर पर ही शहर परियोजना अधिकारी पूजा राठौर के संचालन में इस तरह की स्थिति सामने आ रही है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिला स्तर पर पूरे तंत्र की प्रभावी निगरानी कैसे सुनिश्चित होगी?
निष्कर्ष: पोषण पखवाड़ा या औपचारिकता?
एक ओर बैठकों में पोषण सुधार के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर अनियमितता, लापरवाही और पारदर्शिता की कमी सामने आ रही है।
ऐसे में “पोषण पखवाड़ा” अब एक गंभीर बहस का विषय बन चुका है।
जब तक जमीनी स्तर पर सख्त निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक यह अभियान कागजों और औपचारिकताओं तक सीमित रहने का खतरा बना रहेगा।